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🕵️‍♂️ ठगों का सरताज: Natwarlal की विस्तृत कहानी


ठगों का सरताज नटवरलाल: जीरादेई गाँव से शुरू हुई भारत के सबसे बड़े जालसाज़ की कहानी

भारत के इतिहास में कई अपराधी हुए, लेकिन यदि सबसे चालाक और दिमाग़ी ठग का नाम लिया जाए तो वह नटवरलाल है। नटवरलाल का असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था। उनका जन्म वर्ष 1912 में बिहार के सिवान ज़िले के छोटे से गाँव जीरादेई में हुआ था। साधारण परिवार में जन्म लेने वाले मिथिलेश बचपन से ही तेज बुद्धि और असाधारण नकल क्षमता के लिए जाने जाते थे। वे लोगों के हस्ताक्षर, बोलचाल और व्यवहार को बड़ी बारीकी से देखकर हूबहू उतार लेते थे।

कानून की पढ़ाई ने उनकी ज़िंदगी को नया मोड़ दिया। उन्होंने वकालत की शिक्षा हासिल की, जिससे उन्हें दस्तावेज़, स्टाम्प, बैंकिंग प्रक्रिया और सरकारी कागज़ात की गहरी जानकारी मिली। यही ज्ञान आगे चलकर उनकी ठगी का सबसे बड़ा हथियार बना। वे इतने परफेक्ट नकली दस्तावेज़ बनाते थे कि असली-नकली में फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता था।

नटवरलाल की सबसे बड़ी खासियत थी उनका भेष बदलना। वे कभी सरकारी अधिकारी बन जाते, कभी बड़े उद्योगपति, तो कभी ठेकेदार। उनका आत्मविश्वास, प्रभावशाली अंग्रेज़ी और व्यक्तित्व लोगों को तुरंत भरोसा दिला देता था। वे पहले अपने शिकार से दोस्ती करते, विश्वास जीतते और फिर बड़ी रकम की ठगी को अंजाम देते।

उनसे जुड़ी सबसे सनसनीखेज कहानियों में ऐतिहासिक इमारतों को “बेचने” की घटनाएँ शामिल हैं। कहा जाता है कि उन्होंने सरकारी अधिकारी बनकर जाली कागज़ात तैयार किए और देश की प्रसिद्ध धरोहरों तक के सौदे कर डाले। हालाँकि इन घटनाओं के कुछ हिस्से लोककथाओं जैसे माने जाते हैं, लेकिन इससे उनकी ख्याति और रहस्यमय छवि बहुत बढ़ गई।

नटवरलाल ने ठगी के लिए कई तरीके अपनाए। वे अमीर जौहरियों को नकली चेक देते, बैंक ड्राफ्ट में हेराफेरी करते, फर्जी टेंडर दिलाने का झांसा देते और बड़े उद्योगपतियों के हस्ताक्षर तक कॉपी कर लेते थे। बताया जाता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में लाखों-करोड़ों रुपये की ठगी की, जो उस दौर में बेहद बड़ी रकम मानी जाती थी।

उनकी गिरफ्तारी भी कम रोमांचक नहीं थी। उन्हें 9 से अधिक बार पकड़ा गया, लेकिन हर बार वे किसी न किसी तरीके से फरार हो जाते थे। एक प्रसिद्ध घटना में वे पुलिस हिरासत में ट्रेन से ले जाए जा रहे थे, जहाँ वे शौचालय जाने के बहाने उठे और चलती ट्रेन से कूदकर भाग निकले। इस घटना ने उन्हें अपराध जगत का “लेजेंड” बना दिया।

बुढ़ापे में एक बार फिर उन्हें गिरफ्तार किया गया, तब उनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक थी। खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। उनकी मृत्यु की तिथि आज भी आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं है, जिससे उनकी कहानी और भी रहस्यमयी बन जाती है।

नटवरलाल का प्रभाव भारतीय जनमानस और सिनेमा तक पहुँचा। उनके जीवन से प्रेरित फिल्में बनीं और उनका नाम ठगी का पर्याय बन गया। आज भी यदि किसी को बेहद चालाक ठग कहना हो, तो लोग उसे “नटवरलाल” कह देते हैं।

इस प्रकार बिहार के छोटे से गाँव जीरादेई से निकला एक साधारण लड़का अपनी बुद्धि, जालसाजी और अभिनय कौशल के दम पर भारत का सबसे कुख्यात और चर्चित ठग बन गया। उसकी कहानी अपराध, मनोविज्ञान, लालच और विश्वास—इन सभी मानवीय पहलुओं को उजागर करती है।

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